मालिक और गुलाम : अकबर-बीरबल की कहानियाँ

                    मालिक और गुलाम



एक दिन दिल्ली का कोतवाल दो आदमियों को लेकर बादशाह अकबर के दरबार में आया।

बादशाह के पूछने पर उसने बताया, जहाँपनाह, ये दोनों आदमी आपस में लड़ रहे थे।

काजी जी इन दोनों के झगड़ें को फैसला नहीं कर पाए हैं इसलिए मैं इन्हें यहाँ लाया हूँ।

बादशाह को बताया गया कि ये दोनों व्यापारी हैं बादशाह ने दोनों को देखा और उनसे झगड़े का कारण पूछा।

उनमें से एक ने बताया, जहाँपनाह! मैं एक सौदागर हूँ। मेरा नाम शेरअली है। मैं पांच साल से ज्यादा समय से दिल्ली में रहता हूँ। दिल्ली में आने से पहले मैं अफगानिस्तान में था।

वहाँ यह आदमी मेरा गुलाम था। आज मैंने इसे दिल्ली में देखा तो पकड़ लिया।

यह सुनकर दूसरा व्यापारी बीच में ही बोल पड़ा, जहाँपनाह, यह आदमी झूठा है। इसका नाम शेरअली नहीं है। इसका नाम नसीबा है।

यह मेरा गुलाम था। छह साल की तलाश के बाद आज दिल्ली में मिला है।

इस पर शेरअली बोला, जहाँपनाह, नसीबा तो यह है। मेरा गुलाम था यह। मैं गवाह पेश कर सकता हूँ। वे साबित कर देंगे कि मैं ही शेरअली हूँ।

हो सकता है, जबसे तुम मेरी रकम लेकर गायब हुए हो, तुमने अपना नाम शेरअली रख लिया हो।

यह सुनकर दोनों वहीं झगड़ने लगे। एक ने कहा, तुम्हारी यह मजाल की मुझे नसीब कहो।

दूसरा बोला, अपने मालिक के सामने तुम्हारी यह जुर्रत!

बादशाह ने दोनों को शांत किया और आदेश दिया कि तुम दोनों का फैसला बीरबल करेंगे।

बीरबल अपने आसन से उठे और उन दोनों के पास आए। उन्होंने दोनों की आँखों में आँखें डालकर देखा। दोनों चुपचाप खड़े रहे। इसके बाद बीरबल ने कहा, तुम दोनों पेट के बल फर्श पर लेट जाओ। मैं आँखें बंद करके ध्यान लगाऊंगा और यह पहचान लूंगा कि झूठा कौन है ?

दोनों व्यापारी पेट के बल जमीन पर लेट गए। बीरबल ने एकाएक अपनी आँखे खोली और बोले, मुझे झूठे आदमी का पता चल गया है, जल्लाद को बुलाओ।

जल्लाद अपने कुल्हाड़े के साथ दरबार में हाजिर हुआ। देखते ही बीरबल ने आदेश दिया, उड़ा दो गुलाम का सिर।

जल्लाद के कुल्हाड़ा उठाते ही दिल्ली का सौदागर उछलकर बैठ गया। वह गिड़गिड़ाने लगा, हुजूर, मेरी जान बख्शी जाए।

इस प्रकार बीरबल की बुद्धिमानी से अपराधी पकड़ा गया। नकली शेरअली की सारी दौलत असली मालिक को सौंप दी गई और गुलाम नसीबा को जेल में दाल दिया गया

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