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सोने की मोहरें या न्याय : अकबर-बीरबल की कहानियाँ

सोने की मोहरें या न्याय



एक दिन बादशाह ने बीरबल से पूछा कि अगर तुम्हें न्याय व सोने की मोहर में से चुनने को कहा जाए तो तुम किसे चुनोगे ?"
बीरबल बिना हिचक बोले, “सोने की मोहर।"
अकबर हैरान हुए और बोले, "तुम न्याय की जगह स्वर्ण मुद्रा लेना पंसद करोगे।"
"हां", बीरबल ने कहा।
दरबारी भी यह बात सुनकर हैरान हो गये।
वर्षों से वे सब बीरबल को बादशाह की नजरों से नीचा गिराना चाहते थे।
लेकिन आज तक किसी को सफलता नहीं मिली और आज वह काम बीरबल ने स्वयं कर दिया।
उन्हें अपने भाग्य पर विश्वास नहीं हुआ।
बादशाह बोले, "अगर कोई नौकर इस बात को कहता तो मुझे बुरा व अजीब नहीं लगता।
लेकिन तुम्हारे इस उत्तर से मैं अचम्भित व दुखी हूं।
मुझे नहीं पता कि तुम इतने लालची हो।"
बीरबल ने शांत स्वर में कहा, "जहांपनाह, आपके राज्य में न्याय तो सबको मिलता है,
इसलिए न्याय तो मेरे पास पहले से ही है लेकिन मेरे पास धन की कमी रहती है, इसलिए मैंने सोने की मोहर को चुना।"
अकबर बीरबल के उत्तर से खुश हुए और उसे एक नहीं, एक हज़ार स्वर्ण मुद्राएं दीं।

इस कहानी से शिक्षा : किसी को उसके कार्य की सजा देने से पहले हमें यह जानना चाहिए कि उसने ऐसा क्यों किया। इसके लिए उसके पास ठोस कारण हो सकते हैं जो शायद आपको पता न हों। अतः हर किसी को अपने आप को बचाने का मौका मिलना चाहिए। एक समझदार व्यक्ति कभी अपने मालिक की प्रशंसा करने के मौके को नहीं छोड़ता। वह जानता है मालिक के गुणों को जानना उसके लिए फायदेमंद हो सकता है। यह उसके लिए जादू की तरह काम करता है जैसे बीरबल के लिए।

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